अखिल भारतीय चमार महासभा के गठन बारे स्पष्टीकरण

              यद्यपि जाति व्यवस्था के कारण भारत वर्ष में हजारों सालों तक हमारे पूर्वज गुलामी व पशुओं से बदतरजीवन जीने के लिए मजबूर हुए। हमारे पूर्वजों के साथ जाति के कारण ही पशुओं से अधिक बुरा व्यवहार किया जाता रहा है। इसीलिए बाबा साहेब डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने जाति व्यवस्था को हमारे लिए एक खतरनाक नासूर बताया था, तथा उन्होने जाति प्रथा का समूल नाश करने का आह्वान किया था। यह सही भी है कि जाति व्यवस्था के कारण पूरा बहुजन समाज सही दिशा में संघर्ष करने में विफल रहा है। बाबा साहेब डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने 14 अक्तुबर 1956 को नागपुर में पांच लाख लोगों सहित बौद्ध धम्म की दीक्षा लेते समय बहुजन समाज को जातिविहिन समाज की स्थापना का एक विकल्प दिया था, तथा मनुवाद को समाप्त करने का आह्वान किया था। परन्तु 59 वर्षों के बाद भी हम मनुवाद से बाहर नहीं निकल सके, अपितू पहले से भी अधिक मनुवादी हो गए।सत्य तो यह है कि आज समाज के अधिकतर सबसे साधन सम्पन्न व अधिक शिक्षित व्यक्ति सबसे बङे मनुवादी है। अनपढ़ या साधन विहिन व्यक्ति से उसकी जाति पुछने पर वह अपनी जाति बताने में कोई संकोच नहीं करेगा, परन्तु उच्च शिक्षित व्यक्ति जो उँचे पद पर नियुक्त है, यही साधन सम्पन्न व्यक्ति अपनी जाति छुपा कर अपने आप को उच्च वर्ग का सिद्ध करने की नाकाम कोशिश करेगा। अपने आप को श्रेष्ठ वर्ग का सिद्ध करने के लिए वह मनुवादियों के तथाकथित देवी-देवताओं के आलीशान मंदिर बनवाने के लिए अपनी हैसियत से उपर जा कर तन मन धन का भरपूर योगदान देगा, परन्तु अपने ही चमार समाज के जरूरतमंद व्यक्ति को अपने पास तक खङा नहीं होने देता है। 

                   इस महासभा का गठन करने वाले बुद्धिजीवी यह चाहते हैं कि जाति विशेष के नाम कोई संगठन नहीं बनाया जाए। महासभा के संस्थापक हमेशा से ही बाबा साहेब की बातों पर अमल करते रहे हैं और भविष्य के लिए संकल्पित हैं। परन्तु जब भी बाबा साहेब के मिशन की बात हो या बहुजन समाज के किसी आन्दोलन की बात हो, हर कोई अपनी जाति को आगे रख कर अपने आपको बाबा साहेब का सबसे बङा मिशनरी सिद्ध करने का प्रयास करता है तथा दूसरी जाति पर सब कुछ हङपने का आरोप लगाता है। यहां तक कि बहुजन संगठनों पर भी जोर जबर्दस्ती अपना नेतृत्व थोपने की कोशिश करता है, जब कि नेतृत्व देने में न तो वह ईमानदार होता तथा न ही वह सक्षम होता है। वास्तविकता यह होती है कि ऐसे व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को पूरा करने के लिए केवल राजनीति करते हैं। एक विशेष बात यह है कि जब भी कोई बहुजन आन्दोलन खङा हुआ है, उसमें तन, मन और धन यानि हर प्रकार की भागीदारी में 90 से 95 प्रतिशत योगदान चमार समाज का होता है। परन्तु जब भी चमार समाज पर कोई विपत्ति आई है अन्य जातियों के संगठन संघर्ष में चमार समाज से दूर रहे हैं। 

                               आन्दोलनों की बात की जाए तो वर्तमान समय में सबसे बङा आन्दोलन आरक्षण बचाने का रहा है। आरक्षण की इस लङाई में भी सबसे ज्यादा योगदान चमार जाति ने ही हर कदम पर आरक्षण की लङाई लङ कर पूरे अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण को बचाने का कार्य किया है। यहां एक बात मैं दावे के साथ कहना चाहता हूँ कि चमार जाति ने आज तक स्वंय अपने लिए कोई आन्दोलन या संघर्ष नहीं किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि आज चमार समाज हाशिए पर चला गया है। उपर वर्णित ए व बी वर्गीकरण का उदाहरण चमार समाज द्वारा अपने लिए कोई संघर्ष न करने के कारण हुआ। हालांकि चमार समाज के जागरूक साथियों ने संघर्ष इस वर्गीकरण को माननीय उच्च न्यायलय से समाप्त करवाने का कार्य किया, जिसमें इस महासभा की भी सक्रिय भूमिका रही है। मैं आपको अवगत कराना चाहता हूँ कि आज भी चमार समाज के समकक्ष अन्य अनुसूचित जातियाँ आरक्षण का ए व बी में वर्गीकरण के लिए आए दिन प्रयास करती रहती है। उच्च वर्ग की जातियाँ तो चमार जाति पर पहले से ही उत्पीड़न करती रही है, परन्तु आज चमार समाज के समकक्ष अन्य अनुसूचित जातियाँ भी चमार समाज से नफरत करने लगी है। अब तो यह मांग भी उठने लगी है कि चमार समाज को आरक्षण की परिधि से बाहर कर दिया जाए। इन तथाकथित विरोधियों को एक चमार IAS अधिकारी तो दिखाई देता है, परन्तु सड़कों के किनारे पर जुते मरम्मत करने वाला चमार फिर गांव में बंधुआ मजदूर की तरह उच्च जातियों के खेतों व घरों में काम करने वाला, रोज अत्याचार सहने वाला चमार दिखाई नहीं देता है। यह तो सभी जानते हैं कि गांव में बसने वाला चमार, छुआछात व उत्पीड़न का कितना शिकार होता है। 

                         स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1950 से 1990 तक 40 सालों में चमार समाज ने राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर काफी उन्नति का थी, परन्तु 1990 के बाद चमार समाज राजनैतिक तौर पर धीरे-धीरे पिछड़ने लगा तथा 2000 के बाद तो सभी राजनीतिक दलों ने चमार समाज को दरकिनार करना आरम्भ कर दिया। आज स्थिति यह है कि चमार जाति राजनैतिक हाशिए पर आ गई है। इस स्थिति के लिए जहां चमार समाज के चापलूस व स्वार्थी नेता जिम्मेदार है, वहीं हम स्वंय भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि हमने कभी चमार बन कर किसी को भी अपनी ताकत नहीं दिखाई। यह हमारा चमार समाज अलग-अलग जातियों जैसे रामदासी, सतनामी, अधर्मी, जाटव, चमार, चर्मकार, चामङिया, मेघवाल, भाम्भी, रायगर, मोची, रमदासिया, रैगर, कबीरपंथी, बैरवा, बलई, बुनकर, रैदासी, सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अहीरवार, कुरील, जैसवार, कोली, कोरी जटीया आदि में बंट कर अपनी मूल जाति चमार की पहचान मिटाने में लगा रहा। भारत वर्ष के प्रत्येक राज्य में बसने वाली एक चमार जाति सबसे बड़ी जाति है। मनुवादियों को डर था कि कहीं यह चमार जाति शासक न बन जाए इस लिए इस जाति को अलग-अलग नामों में बांटा गया। इसका एक उदाहरण मैं हरियाणा राज्य का देना चाहुँगा। 01 नवम्बर 1966 में हरियाणा अस्तीत्व में आया था, उस समय अनुसूचित जातियों की सूची में चमार समाज से संबन्धित केवल 5 जातियाँ दर्ज थी। परन्तु आज इसी चमार समाज की 15 जातियों को इस सूची में शामिल किया जा चूका है। ऐसा नहीं है कि यह 10 जातियाँ बाद में दूसरे राज्यों से आ कर बसी तथा न ही ऐसा है कि पहले इनको आरक्षण के लाभ से वंचित रखा गया था। पहले से बसने वाली चमार वर्ग की 5 जातियों के ही टुकड़े कर विभिन्न नामों से अनुसूचित जातियों की सूची के चमार वर्ग में ही डाला गया, तथा इस चमार जाति को तोड़ने का गहरा षड़यन्त्र किया गया है। इसी आधार पर मैं यह सच आप सबके सामने रखना चाहता हूँ कि चमार जाति एक वृक्ष की जड़ की तरह से है, जब कि इस वर्ग की अन्य जातियाँ जिनका उपर वर्णन किया गया है, इस पेड़ की टहनियाँ व पते हैं। जब पेड़ की जड़ यानि चमार का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाएगा तो कुछ समय में ही टहनियाँ व पते गिर कर नष्ट हो जाऐंगे। चमार समाज ही एक मात्र ऐसा समाज है जिसकी बहुजन आन्दोलनों में अग्रणी भागेदारी रही है। यही एक जाति है, जिसने पूरे अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण को बचाने का कार्य किया है। जब यह चमार जाति ही समाप्त हो जाऐगी तो कौन किसके लिए संघर्ष करेगा। जब तक भारत से जाति व्यवस्था का समूल नाश नहीं हो जाता, चमार जाति का अस्तीत्व बनाए रखना अति आवश्यक है।

                           उपरोक्त वर्णित सभी बातों व स्थितियों पर चमार समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों काफी गहन मंथन के बाद तथा सभी जातियों के संगठन बन जाने के काफी समय बाद चमार जाति का गैर राजनैतिक एक समाजिक संगठन बनाने का निर्यण लेकर वर्ष 2002 में अखिल भारतीय चमार समाज महासभा का गठन किया गया। तत्पश्चात अखिल भारतीय चमार समाज महासभा का पंजीकृत संख्या 512/2002-2003 के अन्तर्गत पंजीकरण करवाया गया। वर्ष 2002 में अखिल भारतीय चमार समाज महासभा करते समय इसका कार्यक्षेत्र केवल हरियाणा राज्य तक ही सीमित रखा गया था। महासभा के कार्यों को देखकर अन्य दूसरे राज्यों के जागरूक साथियों ने भी महासभा से जुड़ने की इच्छा जताई। उन जागरूक साथियों के अनुरोध को देखते हुए महासभा के संस्थापकों ने इस महासभा का विस्तार अन्य राज्यों में करके, इसका कार्यक्षेत्र राष्ट्रीय तक बढ़ाने का निर्यण लिया गया है। अतः महासभा अति शीघ्र ही महासभा के नियमों व उप-नियमों में आवश्यक संशोधन किया जा रहा है। 

                अन्त में मैं महासभा के आलोचकों से बात करना चाहुँगा। कई आलोचक यह कहते हैं कि चमार महासभा के गठन से बाबा साहेब डा0 अम्बेडकर की विचारधारा व उनके मिशन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इस बारे मैं उनसे इतना कहना चाहता हूँ कि बाबा साहेब के नाम से ही बाबा साहेब के मिशन को चलाने के लिए हजारों संगठन बने हुए है। परन्तु मैनें देखा है कि अधिकतर संगठन तो बाबा साहेब की विचारधारा को ही नहीं जानते हैं। इन संगठनो के अधिकांश पदाधिकारी तो बाबा साहेब के सिद्धान्तों के एकदम उलट चलते हैं। पूरी की पूरी मनुवादी व्यवस्था के समर्थन में लिप्त रहते है। सीधा-सीधा कहते है कि किसी की आस्था कहीं भी हो सकती है। यह भी तर्क देते है कि बाबा साहेब ने संविधान में सभी धर्मों को बराबर माना है, बाबा साहेब का 1956 में धर्म परिवर्तन करना उस समय मजबूरी थी, जो आज नहीं है। जब कि अखिल भारतीय चमार समाज महासभा पूरी तरह से बाबा साहेब के मिशन के प्रति समर्पित है। कई आलोचक यह कहते हैं कि चमार नाम बहुत गंदा नाम है, तथा चमार शब्द का प्रयोग असैंवधानिक है। इस बारे मैं उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि जब उन्होने स्कूल में दाखिला लेते समय, सरकारी सहायता लेते समय, नोकरी लगने के लिए आवेदन करते समय चमार जाति का शपथ पत्र दिया था उन्हे तब यह शब्द ना तो गंदा लगा तथा ना ही यह शब्द असैंवधानिक लगा। जाति प्रमाण पत्र संविधान के अनुसार बनता है, जिसके अन्तर्गत आपको जारी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र में आपकी जाति चमार साफ-साफ लिखी जाती है। उस समय उन लोगों को चमार असैंवधानिक या गंदा क्यों नहीं लगा। जो व्यक्ति हीन भावना से ग्रस्त होते हैं वही लोग अपनी जाति छुपाने की नाकाम कोशिश करते हैं। 

हंस राज (9416166616)

संस्थापक सदस्य एवं प्रदेश महासचिव